#मौसम के इस उतार #चढ़ाव में 16वीं सदी के प्रसिद्ध #कवि #घाघ की #रचनाएं जरूर #याद कर लेना चाहिए।
#शुक्रवार की बादरी रही #शनिचर-छाए,
#घाघ कहे सुन घागिनी #बिन #बरसे_नहीं_जाए।।
#लोकसंवाद #न्यूज
#वाराणसी। हम सबने "घाघ और घाघनी" का नाम तो अवश्य सुना होगा ! ये दोनों पति पत्नी एक तरह के बहुत बड़े मौसम वैज्ञानिक भी थे। कहा जाता है कि यह दोनों प्रकृति में होने वाले हलके से बदलाव को देखकर मौसम का सही सही अनुमान लगा लेते थे कि आगे कब क्या होने वाला है !
जब जब मैं अपने पैत्रिक गांव #पहाड़पुर जाता था मेरी स्वर्गीय दादी ( जिन्हें मैं माई बुलाता रहा ) वह मात्र हवा का रुख देखकर , चाँद देखकर , आसमान की तरफ देखकर आने वाले मौसम का हाल चाल बता देती थी।
एकबार मैं गाँव गया था तो पुरवाई हवा बह रही थी तो मेरी माई ( दादी ) ने कहा देख दाख के खेतों से जाना पुरवैया बह रही है , कीरा ( सांप ) निकलने का डर रहता है !
और उस दिन एक साँप भी हमारे द्वार पर निकल आया , हालांकि उसको गाँव वालों ने मार ही डाला ! 😡
भाई साहब
वह बरसात से पहले ही बता देती थी कि " सब लोग खेतों से पुवाल और भूसा हटा लो , सोहरा कोण बह रहा है , अब तेज बारिश और आंधी आएगी" ! बताते चलूँ कि सोहरा कोण मतलब उत्तर और पूर्व के कोने से आने वाली हवा होती है!
उस समय सच में चाहे कितनी भी तेज धूप होती थी , बादलों का नामों निशां भले नहीं , पर शाम होते होते तेज आंधी के साथ बारिश भी आ ही जाती थी !
उस वक्त कितना तारतम्य रहता था लोगों का प्रकृति के साथ ! आज तो मोबाइल और जीवन की अंधी दौड़ वाली व्यस्तता ने लोगों का प्रकृति के साथ संपर्क ही मानों तोड़ दिया है !
एकबार मैं गाँव गया था , मुझे सुबह जगाने वाला कोई नहीं होता था ! तब मुझे जगाते थे पक्षी , मोर की कूक , कोयल की कुहू कुहू और भोर में मुर्गे की बांग , सुबह पक्षियों की चहचाहट ! अब तो वह मानों स्वप्न ही हो गए। जो भाग्य वश बच भी गए अब उन पशु पक्षियों पर अयोध्या के टुन्नु जैसे बहेलियों की नजर है।
सच कहूँ तो मेरी दादी नक्षत्रों , तारों , चन्द्रमा , हवा , पक्षियों , चीटियों को देखकर सब अनुमान लगा लेती थी ! दिन हो या रात कभी उन्हें घड़ी देखने की जरुरत ही नहीं पड़ी ! वह रात में सप्तर्षि तारों की स्थिति देखकर समय बता देती थी ! हमारी पत्नी मीरा ने उनसे बहुत कुछ सिखा भी है।
उनके जैसे अनेक पुराने लोग आज भी कुछ हलचल मात्र से मौसम का सटीक अनुमान लगा ही लेते हैं।
जैसे कि
😇चींटी अगर अपने अंडे इधर से उधर करे तो बारिश का संकेत है !
🪼 गौरेया जब धूल में नहाने लगे तो 24 घंटे के अन्दर बारिश का आना लाजिमी है !
🪭 खेतों में लाल रंग का कीड़ा अपने बिल से बाहर निकला दिखे तो बारिश आएगी !
🛜यदि उत्तर दिशा में बिजली चमक रही है और पुरवैया हवा चल रही है तो है तो जल्दी ही बरसात होगी !
🫎 यदि दिन में सियार और रात्रि में कौआ कांव-कांव करे तो बारिश नहीं होगी और अकाल पड़ेगा !
🧌 जब लोमड़ी के बोलने की आवाज सुनाई देने लगे और कांस में फूल आ जाएँ तो समझ जाओ कि अब वर्षा ऋतु खत्म होने वाली है !
🪅 यदि कलश (धातु के बर्तन) में रखा जल अपने आप गुनगुना हो जाए , तो बारिश होगी !
🪽 यदि तीतर नामक पक्षी के रंग के बादल आसमान में हों तो ये बादल बिना पानी बरसाए नहीं जाएँगे !
🪿 एक पक्षी , मुझे उसकी आवाज याद है बस , अगर वह बोलना शुरू कर दे तो मात्र 5 घंटे के अन्दर बारिश आ जायेगी !
टिटहरी पक्षी के देर तक बोलने से बारिश आएगी !
🪩 आर्द्रा नक्षत्र के उतरते हल्की बारिश हो जाए तथा मृगढ़ा नक्षत्र तप जाए तो अच्छी बारिश होने की संभावना होती है !
🫧 ‘शुक्रवार की बादरी, रहे शनिश्चर छाय !
घाघ कहे सुन घाघनी, बिन बरसे नहीं जाय !!
🍁 रोहिणी नक्षत्र में - ‘तपै नौतपा नौ दिन जोय, तौ पुन बरखा पूरन होय’ में कहा है कि यदि इस अवधि (23 मई से 5 जून) में खूब गर्मी पड़ेगी तो उस साल भरपूर वर्षा होगी !
🌵 ‘आदि न बरखै अद्दरा हस्त न बरख निदान,
कहैं घाघ सुन घाघनी, होय किसान पिसान’
कहा गया है कि यदि आद्रा नक्षत्र के प्रारम्भ में तथा हस्त नक्षत्र (26 सितम्बर से 8 अक्टूबर) के अन्तिम चरण में पानी नहीं बरसा तो घाघ कवि घाघनी से कहता है कि इस साल किसान आटे की तरह पिसेगा !
अर्थात किसान बहुत कष्ट उठाएगा !
** पुनर्वसु नक्षत्र या पुष्य नक्षत्र में " पुरवा पुनर्वस भरे न ताल, तौ पुन भरिहै अगले साल’
कहा है कि यदि इस अवधि (5 जुलाई से 1 अगस्त) में तालाब नहीं भरे तो वे अगले साल की बरसात में ही भरेंगे !
** तपैं मृगशिरा तलफें चार।
बन, बालक, अरू भैंस उखार।।
सब कुछ ठीक होने के लिए अर्थात अच्छी बारिश होने के लिए मृगशिरा नक्षत्र की गर्मी से जंगल, बच्चे, भैंस और गन्ने की खेती को कष्ट होना चाहिए !
** आर्द्रा नक्षत्र में हल्की बरसात होनी चाहिए अन्यथा उसके जल्दी विदा होने का खतरा बढ़ जाता है !
** माघ गरगरी जेठ का जाड़।
नदी नार बहि चलै असाढ़।।
अस बोले भड्डर कै जोय।
आसौं बरसा धौं कस होय।।
यदि माघ माह (जनवरी) में उमस, जेष्ठ माह (मई) में मौसम ठण्डा और असाढ़ माह की बरसात में नदी-नाले तेजी से आप्लावित हो जाएँ तो घाघ की पत्नी कहती है कि इस साल की बरसात सन्दिग्ध होगी !
** एक बूँद जौं चइत म परै।
सहस बूँद सावन में हरै।।
यदि चैत्र माह में एक बूँद भी पानी बरसता है तो श्रावण माह में एक हजार बूँदों की कमी हो जाती है अर्थात श्रावण माह की वर्षा घट जाती है !
** चइत कै पछुआ भादों जला।
भादों पछुआ माघ म पला।।
यदि चैत्र माह में पछुआ हवा चले तो भादों माह में अच्छी बरसात होगी पर यदि यही पछुआ भादों में चले तो समझ लेना चाहिए कि माघ माह में पाला पड़ेगा !
** यदि जेठ माह में पुरवाई हवा चलती है तो समझ लेना चाहिए कि सावन माह में बरसात नहीं होगी !
** जब जेठ माह में अच्छी गर्मी पड़ेगी तब समझना चाहिए कि वर्षा ऋतु में अच्छी वर्षा होगी !
** यदि जेठ माह के अन्तिम सप्ताह में मेंढक बोलने लगें तो समझ लेना चाहिए कि अब वर्षा ऋतु जल्दी ही आने वाली है !
** यदि आषाढ़ महीने की पूर्णिमा को चन्द्रमा बादलों की ओट में छुपा रहे तो आप आनन्द मंगल मनाईए क्योंकि इस साल अच्छी बरसात होगी और हर घर में खुशहाली आएगी !
** सावन के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को यदि सूर्योदय के समय सूर्य के दर्शन नहीं हों तो समझ लेना चाहिए कि इस साल देव उठनी ग्यारस तक बरसात होगी !
** सावन के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को यदि सूर्योदय के समय सूर्य के दर्शन हों जाएँ तो समझ लेना चाहिए कि इस साल पानी या तो समुद्र में मिलेगा या गंगा नदी में ! अर्थात भयावह सूखा पड़ेगा !
** सावन के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को यदि आधी रात को बादल गरजें और बरसात हो तो समझ लेना चाहिए कि इस साल सूखा पड़ेगा। यदि इस तिथि को मौसम सूखा रहता है तो मानना चाहिए कि फसलें अच्छी होंगी !
** यदि माघ के माह में आकाश में लाल रंग के बादल घुमड़ रहे हों तो समझ लेना चाहिए कि जल्दी ही ओले गिरने की सम्भावना है !
** यदि माघ माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को बादलों की गर्जना सुनाई दे तो समझना चाहिए कि एक माह तक लगातार बरसात होगी !
** दिन में गरमी रात में ओस,
कहैं घाघ बरखा सौ कोस !
मतलब बारिश बहुत दूर है , बारिश नहीं होगी !
निहितार्थ:
इस तरह प्रसिद्ध कवि घाघ आज भी हमारे मन मस्तिष्क में बसे हुए हैं। आज हमारी दादी भले नहीं रही, लेकिन उनकी कही बातें हम लोगों के जेहन में घर कर गई है।
उन्होंने एक बार कहा घाघ की रचना सुनाते हुए कहा
दिन में गर्मी रात में ओस
कहे घाघ बर खा सौ कोस
गर्मी के आषाढ़ माह में वह अक्सर ही घाघ कवि की रचना सुना देती थी।
वर्षो पूर्व पंडित रामनरेश त्रिपाठी ने घाघ कवि पर एक पुस्तक लिखी और उन्होंने गांव-गांव जाकर उनकी कही सुनी तमाम रचनाओं का संकलन भी किया था। वह पुस्तक आज भी पुराने पुस्तक केंद्रो पर मिल जाएगी।
प्रसिद्ध कवि घाघ 16वीं शताब्दी के सबसे चर्चित और मौसम की जानकारी रखने वाले कवि के रूप में प्रसिद्ध हुए थे। वह कन्नौज के चौधरी सराय गांव के मूल निवासी थे। उन्हें लोक पंडित, कृषि वैज्ञानिक और तरह-तरह के नाम से आज भी लोग याद करते हैं। घाघ कवि के साथ आज अपनी दादी मां को भी प्रणाम करता हूं।
संकलन:डॉ.लोकनाथ पांडेय
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