Dr PRATIBHA SINGH :
भू राजनीतिक अस्थिरता और भारत की कूटनीतिक प्रक्रिया।
भू राजनीतिक (Geopolitical) अस्थिरता वर्तमान वैश्विक परिदृश्य का एक प्रमुख हिस्सा बन गई है। रूस-यूक्रेन संघर्ष, मध्य-पूर्व में तनाव और अमेरिका-चीन के बीच बढ़ते व्यापार युद्ध ने भारत के लिए चुनौतियों और अवसरों का एक नया ढांचा तैयार किया
शोध पत्र: वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता और भारत की रणनीतिक प्रतिक्रिया
1. परिचय (Introduction)
21वीं सदी के तीसरे दशक में दुनिया एक 'बहुध्रुवीय' (Multipolar) व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। शीत युद्ध के बाद की स्थिरता अब समाप्त हो चुकी है। भारत, जो दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, इस अस्थिरता के केंद्र में है। वर्तमान में भारत की स्थिति "रणनीतिक स्वायत्तता" (Strategic Autonomy) और "विश्व मित्र" (Universal Friend) के रूप में उभर रही है।
2. अस्थिरता के प्रमुख कारण और भारत पर प्रभाव
भू-राजनीतिक हलचल ने भारत को कई मोर्चों पर प्रभावित किया है:
* ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security): रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में अस्थिरता के कारण कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव भारत के चालू खाता घाटे (CAD) को प्रभावित करता है।
* आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain): वैश्विक सप्लाई चेन में व्यवधान ने भारत को 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' जैसी नीतियों को गति देने के लिए प्रेरित किया है।
* मुद्रास्फीति (Inflation): खाद्य और ईंधन की बढ़ती कीमतों ने घरेलू बाजार में महंगाई को चुनौती दी है।
3. भारत की रणनीतिक स्थिति (Strategic Positioning)
भारत ने इस अस्थिरता के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है:
| भारत का दृष्टिकोण | प्रभाव |
| रूस-यूक्रेन | कूटनीतिक संवाद और सस्ता रूसी तेल खरीदना | ऊर्जा लागत में कमी और रूस से संबंध बरकरार |
| चीन संबंध | सीमा पर सतर्कता और आर्थिक निर्भरता कम करना | घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा (PLI स्कीम) |
| ग्लोबल साउथ | G20 के माध्यम से विकासशील देशों की आवाज़ बनना | वैश्विक नेतृत्व और नैतिक शक्ति में वृद्धि |
| अमेरिका-पश्चिम | रक्षा और तकनीक (iCET) में गहरी साझेदारी | चीन के प्रभाव को संतुलित करना |
4. आर्थिक चुनौतियां और अवसर
रिसर्च के अनुसार, वैश्विक अस्थिरता भारत के लिए दोधारी तलवार रही है:
* चुनौती: विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) की निकासी और रुपये की विनिमय दर में अस्थिरता।
* अवसर: "China Plus One" रणनीति के तहत बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अब भारत को एक वैकल्पिक विनिर्माण केंद्र के रूप में देख रही हैं।
5. विदेश नीति का विकास (Evolution of Foreign Policy)
भारत अब केवल एक 'मूक दर्शक' नहीं बल्कि एक 'समाधान प्रदाता' (Solution Provider) के रूप में उभर रहा है। 'क्वाड' (QUAD) में सक्रिय भागीदारी और 'ब्रिक्स' (BRICS) का विस्तार भारत की लचीली कूटनीति का प्रमाण है। भारत "गुटनिरपेक्षता" से हटकर "बहु-संरेखण" (Multi-alignment) की नीति पर चल रहा है।
6. आर्थिक प्रभाव: अनिश्चितता और आत्मनिर्भरता
वैश्विक अस्थिरता ने भारत की अर्थव्यवस्था को 'संसाधन झटकों' (Supply Shocks) के प्रति संवेदनशील बना दिया है, लेकिन साथ ही नए आर्थिक प्रतिमान भी गढ़े हैं।
* आयातित मुद्रास्फीति (Imported Inflation): भारत अपनी तेल की जरूरतों का लगभग 80% से अधिक आयात करता है। पश्चिम एशिया (लाल सागर संकट) या रूस-यूक्रेन में तनाव के कारण जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो भारत में परिवहन लागत और अंततः मुद्रास्फीति बढ़ जाती है।
* सप्लाई चेन विविधीकरण (Supply Chain Resilience): चीन और पश्चिम के बीच "Decoupling" (आर्थिक अलगाव) ने भारत के लिए 'China Plus One' रणनीति का द्वार खोल दिया है। एप्पल, सैमसंग और माइक्रोन जैसी कंपनियों का भारत में निवेश बढ़ा है।
* डिजिटल और वित्तीय बुनियादी ढांचा: वैश्विक प्रतिबंधों (जैसे रूस को SWIFT से हटाना) को देखते हुए भारत ने UPI और रुपये (INR) में व्यापार करने पर ज़ोर दिया है, ताकि भविष्य में विदेशी वित्तीय दबावों से बचा जा सके।
* विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव: वैश्विक अस्थिरता के दौरान निवेशक सुरक्षित ठिकानों (जैसे अमेरिकी डॉलर) की ओर भागते हैं, जिससे रुपये की कीमत गिरती है और विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) पर दबाव बढ़ता है।
7. रक्षा क्षेत्र पर प्रभाव: आधुनिकीकरण और स्वदेशीकरण
भू-राजनीतिक अस्थिरता ने भारत की रक्षा प्राथमिकताओं को "अनिवार्य स्वदेशीकरण" की ओर धकेल दिया है।
क) रक्षा आपूर्ति का विविधीकरण
ऐतिहासिक रूप से भारत अपने 60-70% सैन्य हार्डवेयर के लिए रूस पर निर्भर रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण पुर्जों की आपूर्ति में देरी ने भारत को यह सिखाया है कि एक ही देश पर निर्भर रहना जोखिम भरा है। अब भारत:
* फ्रांस (राफेल जेट), अमेरिका (GE इंजन और प्रीडेटर ड्रोन) और इजरायल के साथ साझेदारी बढ़ा रहा है।
ख) 'आत्मनिर्भर भारत' और रक्षा निर्यात
अस्थिरता ने भारत को रक्षा निर्माण का केंद्र बनने के लिए प्रेरित किया है:
* Negative Import Lists: सरकार ने सैकड़ों सैन्य उपकरणों के आयात पर प्रतिबंध लगाकर उनके स्वदेशी निर्माण को अनिवार्य कर दिया है।
* रक्षा निर्यात: फिलीपींस को ब्रह्मोस (BrahMos) मिसाइल का निर्यात और आर्मेनिया को पिनाका (Pinaka) रॉकेट सिस्टम बेचना भारत की बदलती रक्षा छवि को दर्शाता है।
ग) दो-मोर्चों पर युद्ध की चुनौती (Two-Front War Challenge)
चीन और पाकिस्तान के बीच बढ़ता सैन्य सहयोग (CPEC और रक्षा सौदे) भारत के लिए एक स्थायी भू-राजनीतिक सिरदर्द है। इसके जवाब में भारत ने:
* पहाड़ी युद्ध कौशल (Mountain Warfare): LAC पर बुनियादी ढांचे का तीव्र विकास।
* तकनीकी युद्ध: AI, साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष युद्ध (Space Warfare) में निवेश बढ़ाया है।
8. एक संक्षिप्त तुलनात्मक विश्लेषण (Table)
| प्रभाव क्षेत्र | चुनौतियां (Threats) | अवसर (Opportunities) |
| ऊर्जा (Energy) | तेल की कीमतों में वृद्धि | ग्रीन हाइड्रोजन और सौर ऊर्जा में निवेश |
| व्यापार (Trade) | लॉजिस्टिक्स लागत और देरी | नए मुक्त व्यापार समझौते (जैसे UAE, ऑस्ट्रेलिया, UK) |
| रक्षा (Defense) | पुराने हथियारों के पुर्जों की कमी | घरेलू रक्षा उद्योग (Startup ecosystem) का विकास |
| .भू-राजनीति / दोहरे मोर्चे पर तनाव | 'क्वाड' और 'I2U2' जैसे समूहों में ने
9 . निष्कर्ष (conclusion)
वैश्विकभू-राजनीतिक अस्थिरता ने भारत को एक कठिन मोड़ पर खड़ा किया है। जहाँ एक ओर आर्थिक अस्थिरता और रक्षा आपूर्ति की चिंताएं हैं, वहीं दूसरी ओर भारत को अपनी "रणनीतिक स्वायत्तता" सिद्ध करने का मौका मिला है। भारत अब केवल एक बाज़ार नहीं, बल्कि एक सुरक्षा प्रदाता और वैकल्पिक वैश्विक कारखाने के रूप में उभर रहा है। भारत की भविष्य की शक्ति उसके स्वदेशी रक्षा उत्पादन और आर्थिक लचीलेपन पर टिका हुआ है।
भू राजनीतिक अस्भाथिरात ने भारत की चिंता जरूर बढ़ा दी है , परंतु इसनेभारत कोअपनी वैश्विकभूमिका को भी फिर से परिभाषित करने का मौका दिया है ।भारत कोअपनीआर्थिक नींव मजबूत करने, सैन्य आधुनिकरण को तेज करने और ऊर्जा के लिए नवीन श्रोतों की खोज करने की आवश्यकता है। आने वाले समय में भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह वैश्विक तनावों के बीच अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कैसे करता है।