Part ii
ज्वालामुखी का विश्ववितरण
ज्वालामुखी की स्थितियों के विश्वव्यापक प्रतिरूप (global pattern) को तीन पेटियों या मेखलाओं (परिप्रशान्त, मध्य महाद्वीपीय तथा मध्य अटलाण्टिक) में विभक्त किया जा रहा है।
(i) परिप्रशान्त महासागरीय मेखला (Circum Pacific Belt) या विनाशी प्लेट किनारे के ज्वालामुखी -
विश्व के ज्वालामुखियों का लगभग दो तिहाई भाग प्रशान्त महासागर के दोनों तटीय भागों, द्वीप चापों (island arcs) तथा समुद्रीय द्वीपों के सहारे पाया जाता है। ज्वालामुखी की इस श्रृंखला को 'प्रशान्त महासागर का ज्वालावृत्त' (fire girdle of the Pacific Ocean अथवा Fire Ring of Pacific) कहते हैं। यह पेटी अन्टार्कटिका के एरेबस पर्वत से शुरू होकर दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट के सहारे खास कर एण्डीज पर्वत माला का अनुसरण करती हुई उत्तरी अमेरिका के राकीज पर्वत के ज्वालामुखियों को सम्मिलित करके पश्चिमी तटीय भागों के सहारे अलास्का तक पहुँचती है। यहाँ से यह श्रृंखला मुड़कर एशिया के पूर्वी तटीय भाग के सहारे जापान द्वीप समूह तथा फिलीपाइन द्वीप समूह के
ज्वालामुखी पर्वतों को सम्मिलित करती हुई पूर्वी द्वीप समूह पहुँच कर वहाँ पर 'मध्य महाद्वीपीय पेटी' में मिल जाती है। विश्व के अधिकांश ऊंचे ज्वालामुखी पर्वत इसी पेटी में स्थित हैं। इस पेटी में अधिकांश ज्वालामुखी श्रृंखला के रूप में पाये जाते हैं। उदाहरण के लिए अल्यूशियन, जापान द्वीप समूह तथा हवाईलैण्ड द्वीप के ज्वालामुखी, श्रेणी के रूप में पाये जाते हैं। विश्व के उन महत्वपूर्ण ज्वालामुखियों में जो कि समूह में स्थित हैं, इक्वेडर के ज्वालामुखी विश्वविख्यात हैं। यहाँ पर 22 प्रमुख ज्वालामुखी पर्वत समूह में पाये जाते हैं, जिनमें से 15 ज्वालामुखी ऐसे हैं, जिनकी ऊंचाई 15,000 फीट से अधिक है तथा कोटापैक्सी ज्वालामुखी पर्वत जिसकी ऊँचाई 19,613 फीट है, विश्व का सबसे ऊँचा ज्वालामुखी पर्वत है।
इस मेखला में जापान का प्रसिद्ध ज्वालामुखी पर्वत फ्यूजीयामा, फिलापाइन का माउण्ट ताल, माउण्ट मेगान तथा पिनाबी, संयुक्त राज्य अमेरिका का शस्ता, रेनियर तथा हुड, तथा मध्य अमेरिका का चिम्बरेजो आदि सम्मिलित किये जाते हैं। इस मुख्य मेखला के अलावा प्रशान्त महासागर में फैले असंख्य द्वीपों पर अनेक जाग्रत, प्रसुप्त एवं प्रशान्त ज्वालामुखी पाये जाते हैं। यहाँ ज्वालामुखियों का उद्भेदन अमेरिकन तथा प्रशान्त महासागरीय प्लेटों तथा प्रशान्त महासागरीय एवं एशियाई प्लेटों के टकराव के कारण होता है।
(ii) मध्य महाद्वीपीय मेखला (mid continental belt) या महाद्वीपीय प्लेट अभिसरण मेखला-
इस मेखला का प्रारम्भ रचनात्मक प्लेट किनारों अर्थात् मध्य अटलाण्टिक (महासागरीय कटक, अपसरण मण्डल-divergence zone) से होता है यद्यपि अधिकांश ज्वालामुखी विनाशी प्लेट किनारों के सहारे आते हैं क्योंकि युरेशियन प्लेट तथा अफ्रीकन एवं इण्डियन प्लेट (दोनों महाद्वीपीय प्लेट) का अभिसरण होता है। यह मेखला आइसलैण्ड (जो कि मध्य अटलाण्टिक कटक के ऊपर स्थित है) के हेकला पर्वत से प्रारम्भ होती है। यहाँ पर दरारी उद्गार वाले अनेक ज्वालामुखी दृष्टिगत होते हैं। इनमें 1783 ई० का लाकी दरारी ज्वालामुखी काफी महत्वपूर्ण है। 32 किमी लम्बी दरार से 12 घन किलोमीटर लावा का प्रवाह हुआ था। आइसलैण्ड से यह मेखला स्काटलैण्ड होती हुई कनारी द्वीप (आन्ध्र महासागर) पर पहुँचती है। यहाँ पर इसकी दो शाखायें हो जाती हैं। प्रथम शाखा आन्ध महारसगर से होती हुई पश्चिमी द्वीप समूह तक जाती है। दसरी शाखा को एक उपशाखा अफ्रीका में चली जाती है जहाँ तथा दूसरी मुख्य शाखा, स्पेन, इटली होती हुई काकेशिया पहुँचती है। यहाँ से यह हिमालय पर्वत के सहारे बर्मा (मयमार) तक जाती है। याहाँ से दक्षिण की तरफ मुड़कर दक्षिणी पूर्वी द्वीप में जाकर प्रशान्त महासागरीय पेटी से मिल जाती है।
यह मेखला मुख्य रूप सपा के सहारे चलती है। भूमध्य सागर के ज्वालामुखी भी इसी पेटी में सम्मिलित किये जाते हैं। अगर हम आन्ध्र महासागर के ज्वालामुखियों को अलग मेखला में रखें तो मध्यवर्ती पेटी का प्रारम्भ कनारी द्वीप से पूर्व की तरफ समझना चाहिए। भूमध्य सागर के प्रसिद्ध ज्वालामुखी स्ट्राम्बोली, विसूवियस, एटना तथा एजियन सागर के ज्वालामुखी इस मेखला के महत्वपूर्ण अंग हैं। इसके अलावा ईरान का देमवन्द, कोह सुल्तान, काकेशस का एलबुर्ज, अरमीनिया का अरारात तथा बलूचिस्तान के ज्वालामुखी महत्वपूर्ण हैं। भारत का एक मात्र बैरन द्वीप ज्वालामुखी इसी मेखला में आता है।
मध्य महाद्वीपीय ज्वालामुखियों की स्थिति पर यदि ध्यान दिया जाय तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इनका वितरण समान नहीं है। खासकर आल्पस् तथा हिमालय के सहारे इनमें पर्याप्त मध्यान्तर पाया जाता है। इसका मुख्य कारण इन पर्वतों के आस पास के क्षेत्रों में अत्यधिक दबाव के कारण भूपटल की बनावट में सघनता का होना है। इस कारण मैगमा केवल उत्क्रम सतह (thrust plane) के सहारे हो धरातल के ऊपरी भाग तक आ सकता है। यूरोप के अधिकांश ज्वालामुखी मीडियन मास के सहारे पाये जाते हैं। भूमध्य सागर के ज्वालामुखी इनके प्रमुख उदाहरण हैं। परन्तु एशिया का मीडियन मास (तिब्बत का पठार) ज्वालामुखी से रहित है। इसका प्रमुख कारण पठार की अत्यधिक ऊँचाई का होना ही बताया जा सकता है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि ज्वालामुखी प्रायः पतली एवं कमजोर पपड़ी वाले भागों में पाया जाता है।
अफ्रीका के ज्वालामुखी भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। प्रायः ऐसा माना जाता है कि दरारी घाटियों तथा भूभ्रंश घाटियों के सहारे ज्वालामुखी अवश्य पाये जाते हैं क्योंकि दरार के कारण भूपटल काफी कमजोर हो जाता है। परन्तु यह सदैव आवश्यक नहीं है। अफ्रीका की रिफ्ट घाटी के सहारे सर्वत्र ज्वालामुखो नहीं पाये जाते हैं। टान्गानिका झील अत्यधिक गहरी बेसिन में से एक है पर यहाँ पर ज्वालामुखी के कोई चिन्ह नहीं मिलते हैं। यहाँ पर वितरण यद्यपि एक निश्चित दिशा में नहीं बताया जा सकता है तथापि औसत रूप में ज्वालामुखी पूर्व-पश्चिम दिशा में पाये जाते हैं। यहाँ के प्रमुख ज्वालामुखी तथा ज्वालामुखी पर्वत किलीमन्जारो, मेरू, एल्गन, बिरुन्गा, तथा रंगवी हैं। पश्चिमी अफ्रीका का एकमात्र जाग्रत ज्वालामुखी केमरून पर्वत है। उत्तरी अफ्रीका के रेगिस्तानी भागों में हाल ही में कई ज्वालामुखी शंकु तथा क्रेटर देखे गये हैं।
(iii) मध्य अटलाण्टिक मेखला या महासागरीय कटक-
ज्वालामुखी मध्य महासागरीय कटक (mid-oceanic ridges) के सहारे दरार या भ्रंशन का निर्माण होता है। इस घेशन का प्रभाव क्रस्ट के नीचे दुर्बलता मण्डल (asthenosphere) तक होता है। दुर्बलता मण्डल से पेरिडोटाइट तथा बेसाल्ट मैगमा ऊपर उठते हैं। जब गर्म पेरिडोटाइट दुर्बलता मण्डल से ऊपर उठकर विपरीत दिशाओं की और गतिशील प्लेट के बीच निर्मित दरार में प्रविष्ट होती है तो ऊपर स्थित दबाव के कम होने के कारण वह और अधिक पिघल जाती है तथा बेसाल्ट लावा दरारी उद्भेदन के रूप में प्रकट होता है जो दो बराबर भागों में विभक्त होकर अपसरित (diverging) होते हुए प्लेटों के पिछले भागों में संलग्न हो जाता है, जहाँ वह शीतल होने पर जमकर नवीन क्रस्ट का निर्माण करता है। इस प्रकार प्रत्येक क्रमिक लावा प्रवाह के समय निस्सृत बेसाल्ट लावा कटक से दूर होता जाता है। स्पष्ट है कि कटक के पास नवीनतम लावा होता है तथा इससे (कटक से) जितना दूर हटते जाते हैं, लावा उतना ही प्राचीन होता जाता है।
इस तरह की ज्वालामुखी क्रिया सबसे अधिक मध्य अटलाण्टिक कटक के सहारे होती है। इस मेखला की समस्त ज्वालामुखी क्रिया तथा दरारी उद्भेदन दृश्य नहीं हैं क्योंकि अधिकांश क्रियायें जल के आवरण के नीचे होती हैं। आइसलैण्ड ज्वालामुखी क्रिया का सर्वाधिक महत्वपूर्ण सक्रिय क्षेत्र है। 1783 के लाकी उद्भेदन के बाद 1974 का हेकला तथा 1973 का हेल्गाफल उद्गार महत्वपूर्ण है। लेसर एण्टलीस तथा दक्षिणी आन्ध्र महासागर एवं एजोर द्वीप तथा सेण्ट हेलना उत्तरी आन्ध्र महासागर के प्रमुख ज्वालामुखी क्षेत्र हैं। सुदूर उ०-प० में जान मायेन द्वीप पर सक्रिय ज्वालामुखी पाये जाते हैं।