आज का विद्यार्थी और अंधकारमय भविष्य:
शिक्षा, संस्कृति और आत्मा पर मंडराता संकट
यह कोई भावनात्मक लेख नहीं, बल्कि “शैक्षणिक आपातकाल” की घोषणा है।
आज भारत जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें सबसे अधिक चिंता का विषय है—विद्यार्थी वर्ग का बौद्धिक, नैतिक और आध्यात्मिक पतन। शिक्षा जो कभी चरित्र-निर्माण, विवेक-विकास और राष्ट्र-निर्माण का माध्यम थी, आज मात्र डिग्री प्राप्त करने की सीढ़ी बनती जा रही है। यह लेख किसी व्यक्ति, संस्था या वर्ग पर आक्रमण नहीं, बल्कि एक कठोर आत्ममंथन है—जिसे टालना अब देश के भविष्य से खिलवाड़ होगा।
1. NEP 2020 और ‘पास होने की संस्कृति’ -
नई शिक्षा नीति 2020 में 75 अंक की थ्योरी और 25 अंक का आंतरिक मूल्यांकन—व्यवस्था मूलतः अच्छी मंशा से लाई गई थी, परंतु व्यवहार में यह न्यूनतम प्रयास से अधिकतम लाभ की संस्कृति को बढ़ावा दे रही है।
- आंतरिक 25 में से 20–24 अंक आसानी से मिल जाते हैं।
- थ्योरी में 75 में से मात्र 10–12 अंक लाकर 33 का आंकड़ा पार कर लिया जाता है।
परिणाम: सीखना नहीं, केवल पास होना लक्ष्य बन गया है।
शिक्षक के नोट्स, मानक पुस्तकें, शोध-पत्र—इनका महत्व घट चुका है। अब ‘शॉर्टकट’— श्योर सीरीज़, प्रश्न बैंक, गेस पेपर—यही शिक्षा का पर्याय बन गए हैं।
NEP 2020 का उद्देश्य शिक्षा में लचीलापन था, परंतु व्यवहार में यह न्यूनतम प्रयास संस्कृति को बढ़ा रही है।
शोध बताते हैं कि जब आंतरिक मूल्यांकन बिना पारदर्शिता के होता है, तो:
- सीखने की गहराई घटती है।
- अकादमिक ईमानदारी कमजोर होती है।
- शिक्षक पर अनावश्यक दबाव बढ़ता है।
75+25 प्रणाली तभी सार्थक है जब:
1. आंतरिक मूल्यांकन में सख्त रूब्रिक हो,
2. प्रोजेक्ट और असाइनमेंट वास्तविक हों, कॉपी‑पेस्ट नहीं,
3. शिक्षक को स्वतंत्रता और संरक्षण दोनों मिले,
अन्यथा यह नीति योग्यता नहीं, औसतपन को बढ़ावा देती है।
हे विद्यार्थियो! तुम सोचते हो कि कम पढ़कर, शॉर्टकट अपनाकर, नकल करके, केवल डिग्री लेकर क्या तुम सफल हो जाओगे ?
याद रखो— डिग्री तुम्हें नौकरी दिला सकती है, पर ज्ञान के बिना तुम सम्मान नहीं पा सकते।
2. Sheep Herd Mentality: भीड़ का अंधानुकरण -
आज का विद्यार्थी सोचता नहीं, देखता है कि भीड़ क्या कर रही है—और वही करता है।
- सब वही पढ़ते हैं जो ‘आसान’ हो।
- सब वही करते हैं जिससे जल्दी पैसा या डिग्री मिले।
- स्वतंत्र चिंतन, तर्क, मौलिकता—सब हाशिये पर हैं।
यह मानसिकता रचनाकार नहीं, उपभोक्ता पैदा करती है।
3. गुरु-शिष्य परंपरा का विघटन -
भारतीय शिक्षा की आत्मा थी—गुरु के प्रति श्रद्धा। आज स्थिति यह है कि—
- प्रणाम की जगह औपचारिकता ने ले ली है।
- अनुशासन को ‘पुरानी सोच’ कहा जाता है।
- उत्तरदायित्व और मर्यादा बोझ लगती है।
जब शिक्षक का सम्मान समाप्त होता है, तब ज्ञान की गरिमा भी समाप्त हो जाती है।
4. नैतिक पतन, नशा और भोगवाद -
कॉलेज, हॉस्टल और पीजी आज शिक्षा-केंद्र कम और भोग-विलास के अड्डे अधिक बनते जा रहे हैं।
- शराब, सिगरेट, गांजा, चरस—आम बात हो गई है।
- असंयमित यौन संबंधों को ‘मॉडर्न’ कहा जा रहा है।
- बाहर पड़े कंडोम के कचरें—सांस्कृतिक पतन के मूक साक्ष्य हैं।
- यह तथाकथित ‘पश्चिमी स्वतंत्रता’ नहीं, बल्कि अनुशासनहीनता और आत्म-विनाश है।
नशा, भोग, मोबाइल, दिखावा—ये सब तुम्हें आधुनिक नहीं, बल्कि कमज़ोर बनाते हैं।
5. दिखावा, जाति-धर्म और संकीर्ण राजनीति -
आज का युवा—
- जाति, धर्म, संपत्ति का प्रदर्शन करता है।
- आरक्षण चाहता है, पर योग्यता से आगे सोचने को तैयार नहीं।
- विचारधाराओं पर संवाद नहीं, झगड़ा करता है।
इससे राष्ट्रीय एकता कमजोर होती है और सामाजिक ताना-बाना टूटता है।
6. भारतीय दर्शन से दूरी -
सबसे दुखद तथ्य यह है कि—
- वेद, उपनिषद, गीता—‘आउटडेटेड’ लगते हैं।
- भारतीय दर्शन और आधुनिक विज्ञान के संबंध को समझने की जिज्ञासा नहीं।
- ज्ञान और विवेक की जगह केवल सूचना (Information) बची है।
- जब आत्मा भूखी होती है, तब समाज दिशाहीन हो जाता है।
7. भविष्य के दुष्परिणाम -
यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो—
(क) विद्यार्थी का भविष्य -
- खोखली डिग्री, कमजोर कौशल
- मानसिक अवसाद, पहचान का संकट
- चरित्रहीनता और आत्मविश्वास की कमी
(ख) परिवार का भविष्य -
- संस्कारहीन संतान
- पीढ़ियों के बीच टकराव
- भावनात्मक और नैतिक टूटन
(ग) समाज और राष्ट्र का भविष्य -
- अयोग्य नेतृत्व
- सामाजिक अराजकता
- बौद्धिक गुलामी और सांस्कृतिक क्षरण
यह अंधकारमय भविष्य किसी और का नहीं—हमारे अपने देश भारत का है।
8. समाधान: शिक्षा का पुनर्जागरण -
समस्या का समाधान केवल नियमों से नहीं, बल्कि दृष्टि परिवर्तन से होगा।
1. आध्यात्मिक शिक्षा का समावेश -
ध्यान, आत्मचिंतन, नैतिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में लाया जाए।
अध्यात्म को धर्म नहीं, विवेक-विज्ञान के रूप में पढ़ाया जाए।
2. शिक्षक का पुनः सम्मान -
शिक्षक को केवल सिलेबस पूरा करने वाला नहीं, मार्गदर्शक बनाया जाए।
गुरु-शिष्य संवाद को पुनर्जीवित किया जाए।
3. भारतीय ज्ञान परंपरा का आधुनिक प्रस्तुतीकरण -
वेदांत, बौद्ध दर्शन, जैन दर्शन को आधुनिक संदर्भ में समझाया जाए।
भारतीय दर्शन और आधुनिक विज्ञान के अंतर्संबंध पढ़ाए जाएं।
4. रोल मॉडल का निर्माण -
हमें ऐसे विद्यार्थी गढ़ने होंगे जो—
- स्वामी विवेकानंद की तरह निर्भीक हों,
- महात्मा बुद्ध की तरह करुणामय,
- महावीर की तरह संयमी,
- और डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की तरह वैज्ञानिक व राष्ट्रभक्त हों।
उपसंहार -
शिक्षा का उद्देश्य नौकरी नहीं, नर-निर्माण है।
- यदि आज हमने विद्यार्थियों को ज्ञान, चरित्र और अध्यात्म की ओर नहीं मोड़ा, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी।
- यह लेख एक चेतावनी है— अब भी समय है।
- राष्ट्र का भविष्य कक्षा में बैठा है— प्रश्न यह है कि हम उसे क्या दे रहे हैं: डिग्री या दिशा?
- आज का विद्यार्थी पढ़ना नहीं चाहता, सोचना नहीं चाहता, लिखना नहीं चाहता—उसे केवल पास होना है। यह प्रवृत्ति यदि रोकी नहीं गई, तो भारत ज्ञान-आधारित राष्ट्र नहीं, बल्कि डिग्री-धारी भीड़ बन जाएगा।
- जो छात्र किताब से भागता है, वह जीवन की कठिनाइयों से भी भागेगा।
- जो अनुशासन नहीं सीखता, वह स्वतंत्रता संभाल नहीं पाएगा।
- जो भोग को लक्ष्य बनाता है, वह राष्ट्र के लिए बोझ बनता है।
आज शिक्षक डर रहा है, विद्यार्थी अहंकारी हो रहा है और शिक्षा व्यापार बन चुकी है। यह त्रिकोण राष्ट्रघाती है।
अब भी समय है— हे विद्यार्थियों, किताबें उठाओ, प्रश्न पूछो, स्वयं से युद्ध करो। आलस्य तुम्हारा शत्रु है, विवेक तुम्हारा मित्र।
अंतिम आह्वान -
- भारत को और उपभोक्ता नहीं चाहिए, भारत को विचारक, तपस्वी, वैज्ञानिक और चरित्रवान नागरिक चाहिए।
यदि शिक्षा अध्यात्म से कट गई, तो विज्ञान विनाश करेगा, और यदि अध्यात्म विज्ञान से जुड़ा, तो भारत पुनः विश्वगुरु बनेगा।
यदि आपने यह लेख अंत तक पढ़ा है, तो स्पष्ट है कि आप केवल अपने भविष्य के लिए नहीं, बल्कि अपने देश, समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सोचने वाले व्यक्ति हैं।
पढ़ते रहिए, सोचते रहिए—क्योंकि राष्ट्र का भविष्य भीड़ से नहीं, जागरूक मस्तिष्कों से बनता है।