Mahadev Mahavidyalaya ज्वालामुखी (Volcanoes)

ज्वालामुखी (Volcanoes)

📅 10 Jan 2026 | 🏫 GEOGRAPHY | 👁️ 144 Views

Dr Pradeep Kr Gautam
GEOGRAPHY

ज्वालामुखी (Volcanoes)

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है ज्वालामुखी अर्थात ज्वाला या आग का मुख। अर्थात पृथ्वी के धरातल पर वह छिद्र जहां से तप्त मैग्मा, गैस-वाष्प, धूल, राख आदि निकलते हैं वह ज्वालामुखी कहलाता है ।

वरसेस्टर ने ‘ज्वालामुखी क्रिया’ (vulcanicity) के लिए 'Vulcanism' शब्द का प्रयोग किया है। इनके अनुसार ज्वालामुखी वह किया है, जिसमें गर्म पदार्थ का धरातल की तरफ या धरातल पर आने की सभी क्रियाएँ सम्मिलित को जाती हैं।'

ज्वालामुखी से निस्सृत पदार्थ-


ज्वालामुखी से निस्सृत पदार्थ में सर्वाधिक मात्रा जलवाष्प (लगभग 60 से 90 प्रतिशत) की होती है और गैस के रूप में कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन और सल्फर डाइऑक्साइड हानिकारक गैस भी निकलती है। इसके अलावा ज्वालामुखी से निस्सृत बड़े-बड़े टुकड़ों को बम कहते हैं। मटर के दाने के आकार वाले टुकड़ों को लैपिली कहते हैं। और बहुत बारीक कणों को ज्वालामुखी धूल या राख कहते । जब उद्‌गार के साथ द्रव रूप में पिघला हुआ भाग बाहर आता है तो उसे लावा कहते हैं।

ज्वालामुखी के उद्‌गार स्वरूप और तीव्रता के आधार पर वर्गीकरण

उपर्युक्त आधार पर ज्वालामुखी को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है-

(i) _केन्द्रीय उद्‌गार वाले ज्वालामुखी_ 
(ii) _धरातलीय या दरारी उद्‌गार वाले ज्वालामुखी।_

यहां पर केवल केन्द्रीय उद्‌गार वाले ज्वालामुखी के बारे में बताया गया है जो निम्न प्रकार के हैं-

1. हवाई तुल्य ज्वालामुखी।
2. स्ट्रामबोली तुल्य ज्वालामुखी।
3. वलकैनो तुल्य ज्वालामुखी।
4. पीलियन तुल्य ज्वालामुखी।


1. हवाई तुल्य ज्वालामुखी-


इस प्रकार के ज्वालामुखीयों का उद्‌गार शातवढंग से होता है तथा विस्फोटक बहुत कम होता है। इसका मुख्य कारण लावा का पतला होना तथा गैस की तीव्रता में कमी का होना है। इस कारण गैस धीरे से लावा से अलग होकर भूपटल पर प्रकट हो जाती हैं। उद्‌गार के समय लावा के छोटे छोटे लाल पिण्ड गैसों के साथ ऊपर उछाल दिये जाते हैं। जब वायु द्वारा ये लाल पिण्ड रोक लिये जाते हैं तो लगता है आकाश में लावा पिण्ड केशों (hair) की तरह उड़ रहे हो। हवाई द्वीप के लोग इसे अपनी अग्निदेवी पीली (pelee) की केशराशि समझते हैं। इस तरह का उद्‌गार खासकर हवाई द्वीप पर होता है, जिस कारण इस प्रकार के ज्वालामुखीयों का नामकरण हवाई प्रकार के ज्वालामुखी' किया गया है।

2.स्ट्राम्बोली तुल्य-

इस तरह का ज्वालामुखी प्रथम प्रकार की अपेक्षा कुछ अधिक तीव्रता से प्रकट होता है। जब गैसों के मार्ग में रुकावट होती है तो कभी-कभी विस्फोटक उद्‌गार भी होते हैं। तरल लावा के अतिरिक विखण्डित पदार्थ, जैसे ज्वालामुखी धूल, झामक (punicont), अवस्कर (scona) तथा ज्यालामुखी बम भी उद्‌गार के समय निकलते हैं, जो अधिक ऊँचाई पर जाकर पुनः कैंटर में गिर पड़ते हैं। इस प्रकार का उद्‌गार भूमध्य सागर में सिसली द्वीप के उत्तर में स्थित लिपारी द्वीप के स्ट्राम्बोली ज्वालामुखी में पाया जाता है तथा इसी के नाम पर इस तरह के उद्‌गार वाले ज्वालामुखियों को 'स्ट्राम्बोली तुल्य   ज्वालामुखी कहते हैं।

3. वलकैनो तुल्य ज्वालामुखी
 

इस प्रकार का ज्वालामुखी प्रायः विस्फोट एवं भयंकर उद्‌गार के साथ ही प्रकट होता है। इसमे निस्सृत लावा इतना चिपचिपा एवं लसदार होता है की दो उद्गगारों के बीच यह ज्वालामुखी छिद्र पर जमकर उसे ढ़क लेता है। इस तरह गैसों के मार्ग में अवरोध हो जाता हैं। परिणामस्वरूप गैसे अधिक मात्रा में एकत्रित होकर तीव्रता से ऊपर वाले अवरोध को उड़ा देती हैं। इनका आकार प्रायः फूलगोभी के रूप में होता है। इस तरह के उद्‌गार से एसिड से लेकर पैठिक (बेसिक) सभी प्रकार का लावा निस्सृत होता है। इस प्रकार के ज्वालामुखी का नामकरण भूमध्य सागर स्थित लिपारी द्वीप के प्रसिद्ध ज्वालामुखी वलकैनो (vulcano) के आधार पर किया गया है। इसमें प्रत्येक अगला उद्‌भेदन पिछले उद्‌गार से निर्मित लावा की परत को उड़ाकर होता है।

4. पीलियन तुल्य ज्वालामुखी

पीलियन प्रकार के ज्वालामुखी सबसे अधिक विनाशकारी होते हैं तथा इनका उद्‌गार सबसे अधिक विस्फोटक एवं भयंकर होता है। इनसे निकला लावा सबसे अधिक चिपचिपा तथा लसदार होता है। उद्‌गार के समय ज्वालामुखी नली में लावा की कठोर पट्टी जमा हो जाती है तथा अगले उद्‌गार के समय भयंकर गैसें इन्हें तीव्रता से तोड़‌कर आवाज करती हुई धरातल पर प्रकट होती हैं। इनसे निस्सृत लावा तथा विखण्डित पदार्थ सर्वाधिक होते हैं। प्रज्जवलित गैसों के कारण ज्वालामुखी मेघ प्रकाशमान हो जाते हैं। 8 मई, सन् 1902 ई० को पश्चिमी द्वीपसमूह के मार्टिनिक द्वीप पर पीली (pelee) ज्वालामुखी का भयंकर उद्‌भेदन हुआ था। इसी आधार पर अत्यधिक विस्फोटक उद्‌गार वाले ज्वालामुखियों का 'पीली तुल्य ज्वालामुखी' कहते हैं। इनके उद्‌गार से पहले शंकु या गुम्बद पूर्णतया या अधिकांश रूप में नष्ट हो जाता है। इसी तरह जावा एवं सुमात्रा के मध्य सुण्डा जलडमरूमध्य में सन् 1883 में क्राकाटाओ (Krakatao) ज्वालामुखी का उद्‌गार हुआ था, जिससे पुराने शंकु का एक तिहाई भाग हवा में उड़ गया। भयंकर गैस एवं वाष्प के कारण 17 मील (27 किमी०) की ऊंचाई तक बादल घिर गये। इतना ही नहीं, अगले उद्‌गार के समय (प्रथम उद्‌गार के केवल एक दिन बाद) ज्वालामुखी धूल एवं राख तथा वाष्प के बादल 50 मील (80 किमी०) की ऊँचाई तक आकाश में पहुंच गया। द्वीप का दो तिहाई भाग सागर में निमज्जित हो गया। उद्‌गार की भयंकर आवाज 3000 मील (4800 किमी०) दूर आस्ट्रेलिया तक सुनी गयी तथा भूकम्प के कारण सागर में 120 फीट ऊंची लहर उठ गयी, जिससे जावा एवं सुमात्रा के तटीय भागों में 36,000 व्यक्ति मारे गये।

*क्रमशः...*


🔗 Share:

Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
← Back to Faculty Insights