“कहने को साथ अपने एक दुनिया चलती है, पर छुप के इस दिल में तन्हाई पलती है” - जावेद अख्तर
ज़िंदगी में एक ऐसा समय ज़रूर आता है, जब हमें लगता है कि हमारे आसपास के लोग हमें समझ ही नहीं पा रहे हैं । करियर, दोस्ती, प्यार और भविष्य को लेकर हमारे मन में कई सवाल होते हैं। लेकिन कभी पापा नहीं समझ रहे होते, कभी मम्मी तो कभी समाज हमें टोकता रहता है क्योंकि हम उनसे थोड़ा अलग सोचते हैं।
हम कुछ कहना चाहते हैं, लेकिन बात अधूरी रह जाती है। हमारे मन की बात कोई सुनता नहीं, या सुनकर भी समझना नहीं चाहता। ऐसे समय में इंसान खुद को अकेला महसूस करने लगता है, भले ही भीड़ में क्यों न हो। तब मन में यह सवाल उठता है—“क्या मेरी सोच गलत है?”
असल में जब लोग हमें नहीं समझते, तो सबसे पहले हमें खुद को समझना चाहिए। कई बार हम अपनी बात साफ़ शब्दों में रख नहीं पाते हैं, या सामने वाला हमें अपनी सोच के चश्मे से देखने लगता है। हर इंसान का सोचने का तरीका अलग होता है। इसलिए यह ज़रूरी नहीं कि हर कोई हमें उसी तरह समझे, जैसे हम चाहते हैं।
ऐसे समय में खुद पर शक करने के बजाय खुद पर भरोसा रखना ज़्यादा ज़रूरी होता है। अगर आपकी नीयत साफ़ है और आप सही दिशा में मेहनत कर रहे हैं, तो देर-सवेर लोग आपकी बात समझेंगे, और अगर न भी समझें, तो भी आपकी मेहनत और ईमानदारी कम नहीं हो जाती।
यह भी सच है कि अकेलापन हमें मजबूत बनाता है। जब कोई हमें नहीं समझता, तब हम खुद के सबसे अच्छे साथी बन जाते हैं। अपनी भावनाओं को किसी भी रूप में व्यक्त कर, जैसे डायरी में लिखकर, पेंटिंग बनाकर या एक सिंपल स्टेटस लगाकर, हम खुद को जानने लगते हैं। हम अपनी कमज़ोरियों को पहचानते हैं और अपनी ताकत को समझते हैं। यही समय हमें अंदर से बड़ा बनाता है।
इसलिए अगर आपको लगे कि लोग आपको नहीं समझते, तो इसे अपनी हार मत समझिए। यह आपके अलग सोचने और आगे बढ़ने का संकेत है।