वेद का अर्थ है 'ज्ञान' । वेद चार हैं- ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद । इसमें ऋग्वेद सर्वाधिक प्राचीन वेद है जो दश मण्डलों में विभक्त है। वेद किसी एक पुरुष की रचना नहीं है अपितु यह ऋषि महर्षियों द्वारा हजारों वर्षों में अनुभूत किये गये तत्वों का साक्षात् प्रतिपादक है। वेद आर्य जाति के प्राण हैं। वेदों में पर्यावरण के स्वरूप को जानना और उसे संक्षेप में व्यक्त करना अत्यन्त कठिन कार्य है, लेकिन इसके अध्ययन से पता चलता है कि वैदिक साहित्य पर्यावरणीय तत्वों की व्याख्या करता है। तत्कालीन पर्यावरण में जो तत्व वर्णित किये गये हैं उनके बारे में ऋषियों ने प्रकृति का वर्णन करते हुए पर्यावरणीय तत्वों की व्यापक विर्वचना की है। इसमें पर्यावरण को परमसत्ता से सम्बद्ध बताया गया है। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में बताया गया है कि संसार की समस्त क्रियायें उसी परमसत्ता की इच्छा से संचालित होती है।
उसकी इच्छा के विपरीत कुछ भी सम्भव नहीं है- "पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् । उतामृतत्वस्येशानोयदन्नेनाति रोहति।”
पर्यावरण को शुद्ध करते थे । यज्ञ से निकलने वाला धूम्र मारूत नन्दन मिश्रा* वायुमण्डल में फैलकर बादलों से पृथ्वी पर जल वृष्टि होती थी। जिससे अन्न व औषधियां उत्पन्न होती थी। इससे वातावरण शुद्ध होता है। अग्नि गृहस्थ के देवता है इस कारण इन्हें 'गृहपति' भी कहा गया है। अग्नि अपने उपासकों करते हैं, उन्हें वह सभी प्रकार के सुख व ऐश्वर्य प्रदान करते के महान उपकारक हैं जो उनकी स्तुति करते हैं, हवि प्रदान हैं। वेदों में मनीषियों ने अत्यन्त सरलवाणी में
अग्नि देवता की स्तुति की है- "अग्निर्होता कविक्रतुः सत्यश्चित्रस्रवस्तमः देवो देवे भिरागमत् । ।"
निर्देश दिये गये हैं। ऋग्वेद में आया है कि यदि सभी लोग वेदों में जल को प्रदूषण से मुक्त रखने के लिए मधुर जल को प्रदूषण से मुक्त रखगें तभी जल की उष्मा, मानव को तेज, प्रज्ञा और दीर्घायु प्रदान कर सकती है।
ऋग्वेद में जल के स्रोतों का वर्णन करते अपने रक्षा की बात कही गयी है- हुए इससे "या आपो दिव्या उत वा स्रवन्ति खनित्रिमा उत वा याः ऋग्वेद में दीर्घतमा ऋषि ने पर्यावरण के अनेक तत्वों स्वयंजाः । पर विचार व्यक्त किया है-
“सकृद्ध धौरणायत सकृद् भूमिरणायत् । पृश्न्या दुग्धं सकृत्ययस्तदव्यो नानु जायते ।।" अर्थात्-
निश्चित ही सूर्य एक बार उत्पन्न हुआ, भूमि एक बार उत्पन्न हुई तथा जल एक बार उत्पन्न हुआ, क्योंकि सृष्टि के लिए ये तीन तत्व विशेष महत्वपूर्ण है। बाकी सभी वस्तुयें तो इन्हीं से उत्पन्न मानी जाती है। एक अन्य ऋग्वेदीय मंत्र में बताया गया है— “चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत । मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत ।।"
अर्थात्- उस परमपिता के मन से चन्द्रमा, नेत्रों से सूर्य प्राणों से वायु तथा मुख से अग्नि व इन्द्र की उत्पत्ति हुई है। इसी प्रकार से ऋषियों ने अनेक प्रकार से रूपक बना करके इस तत्व को सिद्ध किया है कि सभी लोग इस परमसत्ता से उत्पन्न हुए हैं, परमात्मा एक ही है। ऋषियों का उद्देश्य था कि सभी लोग इस पर्यावरण की रक्षा करें।
ऋग्वेद में एक जगह पर्यावरण की रक्षा के सम्बन्ध में कहा गया है कि- “महत्तदुल्लवं स्थविरं तदासीदृयेम विष्ठितः । प्रविवेशियाषः । ।" अर्थात्– एक अतिव्यापक मोटी परत द्वारा जलीय वातावरण का निर्माण होता है।
वेदों में वर्षा के शुद्ध जल के संरक्षण का निर्देश दिया गया है। वर्षा के जल को एकत्र करने के लिए मानवों द्वारा कृत्रिम जलाशय, विस्तृत भूमि की खुदाई करके बनाया जाता था। जिसे ऋग्वेद में 'खनित्रम' शब्द से कहा गया है-
“या आपोदिव्या उतवा स्रवन्ति । खनित्रिमा उत वा याः स्वयंजाः । ।” वैदिक ऋषियों की यह मान्यता हमारे धर्म संस्कृति में आज भी परम्परा के रूप में चली आ रही है। पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए ऋग्वैदिक काल में यज्ञ प्रमुख साधन था।
विविध प्रकार के यज्ञों के आयोजन से अग्नि में प्रक्षिप्त हवन सामग्री में प्रज्ज्वलन से भौतिक व आध्यात्मिक परमिता जुलाई-सितम्बर 2009 समुद्रार्था या शुचयः पावकास्ता आपो देवीरिह मामवन्तु।।” अर्थात्- 77 हे मनुष्यो ! जो शुद्ध जल झरते हैं अथवा खोदने से उत्पन्न होते है समुद्र के लिए है जो पवित्र करने वाले है वे देदीव्यमान जल इस संसार में रक्षा करें।
वैदिक ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व पर्यावरण को सन्तुलित करने और उसे प्रदूषण से मुक्त रखने के लिए आवश्यक सावधानियों को धारण किया। फलतः वैदिक काल पर्यावरण प्रदूषण से मुक्त रहा।
इस प्रकार हम देखते है कि ऋग्वैदिक काल में पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए हमारे ऋषियों-महर्षियों ने व्यापक प्रयास किया। ऋग्वेद में वर्णित पर्यावरण संरक्षण इस सुदीर्घ एवं अति प्राचीन परम्परा को आधुनिकता की आग में आने से रोकने का हर संभव प्रयास करते हैं, आधुनिक समय में प्रौद्योगिकी तथा उसकी प्रकृति का शोषण, वैभव-विलास, रीति, नीति ने स्वस्थ पर्यावरण को आज संकटापन्न कर दिया है, जिसके परिणास्वरूप मानव जीवन अत्यन्त त्रस्त दिखायी पड़ रहा है।
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सन्दर्भ ग्रन्थ सूची ऋग्वेद - 10/90/2 ऋग्वेद - 6/98/22 ऋग्वेद - 10/90/13 ऋग्वेद - 10/51/1 ऋग्वेद - 7/49/2 ऋग्वेद - 1/1/5 ऋग्वेद - 1/23/24 ऋग्वेद - 7/49/2